Wednesday, January 12, 2011
अगर भीतर कुछ धधक नहीं रहा तो आपकी सिर्फ उम्र युवा है
युवावस्था! यानी ज्वलंत धमनियों का अविरत स्पंदन। प्रकृति द्वारा मानव को प्रदत्त सबसे श्रेष्ठ वरदान। जीवन के नगर का एकमात्र राजपथ। प्रकृति के साम्राज्य का वसंत, मन-मयूर के पूर्ण फैले हुए पंख, विकसित शरीर-भुजंग का सुंदर चितकबरा फन, भावनाओं के उद्यान का सुगंधित केवड़ा, विश्वकर्ता के अविरत दौड़नेवाले रथ में सबसे शानदार घोड़ा, मनुष्य का गर्व से सिर उठाकर चलने का समय, कुछ न कुछ अर्जन करने का समय, शक्ति का और स्फूर्ति का काल, कुछ न कुछ करना चाहिए, इस भावना को सच्च्े अर्थो में प्रतीत करानेवाला काल।— शिवाजी सावंत की ‘मृत्युंजय’ से
कोई आठ साल के रहे होंगे नरेंद्र जब यह घटा। आलीशान बैठक कक्ष में रखे हुक्के और चिलम दोनों पी-पीकर देखे। मासूम उत्तर से सब हैरान। कहा- समझना चाहता था कि हुक्के से कितना ‘बड़ा’ और चिलम से कितना ‘छोटा’ बन जाता हूं! दरअसल शुरू से बताया गया था कि ऊंचे लोगों के लिए हुक्के हैं और नीचे के लिए चिलम। घर की महिलाओं को डर था पिता नाराज होंगे। उन्होंने किंतु सुनते ही कहा- नरेंद्र, तुमने मेरी आंखें खोल दी। कोई वर्ण से या धन से छोटा-बड़ा नहीं होता। तुम तो मेरे पिता हो। नरेंद्र के ऐसे बचपन ने उन्हें युवा होने पर विवेकानंद बनाया। इतना युवा कि ३९ की छोटी उम्र में ही सारे संसार में अमर ऊर्जा भर कर चले गए। उतना ही योगदान पिता की युवा सोच का भी उन्हें स्वामी बनाने में रहा होगा। दोनों के ही भीतर कुछ धधक रहा था। नरेंद्र में जिज्ञासा की अग्नि, तो पिता में परिवर्तन का ईंधन।
युवा तो अवस्था ही ऐसी होती है कि जिज्ञासा जगे। इसमें विशेष क्या है? वैसे ही किसी ने सुधार की सुध बेटे से ले ली, तो उसकी सोच युवा क्यों कहलाएगी? यही अंतर है आपके युवा होने या आपकी उम्र के युवा होने में। अंतर जटिल है। किंतु है स्पष्ट। उदाहरणों से समझ सकते हैं।
सभी युवा हैरान होते हैं। परेशान होते रहते हैं। उनके अपने सपने हैं। अपनी महत्वाकांक्षाएं। पूरी न होने पर आता है क्रोध। उपजती हैं कुंठाएं। होते हैं प्रश्न। अनंत प्रश्न। सदैव अनुत्तरित। इसलिए और छटपटाहट।
और उत्कंठा। और उत्तेजना। जिज्ञासा यह कि उनकी इच्छाओं का सम्मान कौन करेगा? समाज उन्हें कर्णधार कहते नहीं अघाता- किंतु उनके लिए करता कुछ भी नहीं। क्यों?
मूल प्रश्न पर लौटते हैं। इस जिज्ञासा को कोई अपने भीतर आग की तरह धधका ले- तो युवा हो जाएगा। बाकी की सिर्फ उम्र युवा रहेगी।
संसार में इच्छाएं सर्वाधिक दुख देती हैं। युवा सिद्धार्थ ने जब यह प्रश्न स्वयं से किया तो केवल प्रश्न नहीं किया। उत्तर खोजने के लिए टूट पड़े। एक आग धधकी। सिद्धार्थ उसमें तपे। पहाड़ों-जंगलों से टकराए। ज्ञान का ईंधन डालते रहे। प्रबुद्ध हुए। यह भी सिद्ध किया कि धधकने का अर्थ हिंसक होना नहीं है। आक्रमण तो अज्ञानता पर करना होगा।
विवेकानंद और बुद्ध तो पहुंच से परे, अति आदर्श उदाहरण हैं। हमारे सभी ४क्-५क् करोड़ युवा तो वैसे नहीं हो सकते। किंतु यदि हमारी सिर्फ उम्र युवा नहीं है तो हमारे भीतर छोटे-बड़े योद्धा संन्यासी छिपे मिलेंगे। बोधिवृक्ष पनपते दिखेंगे। बस सोच सच्ची युवा होनी चाहिए। आसपास ही उदाहरण मिल जाएंगे। सेंट्रल इंडिया में एक ख्यात नाम है। डॉ. एस. के. मुखर्जी। मरीजों को जितना ठीक करते, उतना ही डांटते। प्रतिष्ठा बढ़ती ही जाती। क्योंकि आप अगर बीमार हैं तो मानो उनकी अमानत हो गए। जैसा वे चाहें, वैसा ही करना होगा। एक बार इंदौर के एक घर सुबह ५.३क् बजे जोर-जोर से दरवाजा बजा। कड़कड़ाती ठंड में सब बाहर झुंझलाते आए। दरवाजे पर डॉ. मुखर्जी खड़े थे। कंपकंपाते हाथों से एक पर्चा थमाया दवाओं का। गुस्से से बोलते रहे, बड़बड़ाते रहे- इमरजेंसी आने पर किसी के इलाज के लिए बाहर जाना पड़ रहा है। आपका लड़का लापरवाह है। बुखार नहीं उतरा तो परेशानी चढ़ेगी। इसलिए दवाएं दे जा रहा हूं। ध्यान से ले लेना। और चल दिए। तब कोई साठ से ऊपर रही होगी डॉ. मुखर्जी की उम्र। कॉलेज में पढ़ रहे बीमार बेटे ने रजाई से बाहर निकलकर प्रश्न किया- पापा, इनके जैसा यंग कब बनूंगा?
यदि कोई पूछे कि वो एक बात कौन सी है जो आत्मसात कर लें तो सोच से, कर्म से युवा हो जाएंगे? उम्र को मात दे देंगे? कोई एक शब्द? विद्वानों के अलग-अलग दृष्टिकोण हो सकते हैं। तथ्य हो सकते हैं। तर्क हो सकते हैं। पर एक शब्द है, जिसकी हम चर्चा कर सकते हैं। जो सरल है। किंतु सिर्फ सुनने में। पालन करने में सर्वाधिक कठिन। पर है स्पष्ट उपाय। वह है- अनुशासन। कोई ऐसी चुनौती नहीं जो अनुशासित व्यक्ति पूरी न कर सके। कोई बाधा अनुशासन के समक्ष टिक नहीं सकती। बस अनुशासन के अर्थ समझने होंगे। बचपन से हमें जो समझाया गया- उससे काफी कुछ गलत हो गया। हमेशा बताया गया कि समय पर आने-जाने को अनुशासन कहते हैं। या शांत रहने को। या बड़ों का सम्मान करने को। या अनुशासन वह है जो सेना में देखने को मिलता है। वगैरह।
ये गलत नहीं है। किंतु सिर्फ यही अनुशासन है- ऐसा संदेश गलत चला गया। जीवन का हर वह काम जो औरों के लिए किया गया हो, अनुशासन है। हर वह संघर्ष जो आपकी महत्वाकांक्षा को सही आकार देने के लिए हो, अनुशासन है। बच्चों से सीखना अनुशासन है। बड़ों के बड़प्पन को अपनाना अनुशासन है। बुराई से लड़ना, भलाई के लिए जूझना- सब अनुशासन है। किसे कितना, क्यों और कैसे आंकना अनुशासन है।
राजस्थान-गुजरात सीमा पर बसा दोनों संस्कृतियों का गजब संजोग है बांसवाड़ा। वहां के खुशमन भाई मास्टर साब और उनके सारे भाइयों का जीवट देखते ही बनता था। किसी अपरिचित के यहां भी निधन का पता चलते ही अपना सारा काम छोड़ देते। मदद के लिए उठ खड़े होते। अंतिम संस्कार के सारे काम करते। फिर मीलों दूर, चिलचिलाती धूप में माही सागर तक नंगे पैर दौड़ते हुए शवदाह के लिए जाते। कई लोगों के मन में आता- ये इतना संघर्ष क्यों करते होंगे? मेरे पिता ने उत्तर दिया था- किसी के दुख को बांटना संसार का सबसे पवित्र काम है। सारे नौजवान जो नहीं कर सकते थे, उम्र से पके किंतु परोपकार से तपे खुशाभाई, अपने भीतर धधकती भावना से कर पाते। युवा इसे कहते हैं। अनुशासित युवा ऐसे ही होते हैं।
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यार दिल जीत लिया तुमने तो!
ReplyDeleteबहुत ही प्रेरक शब्द हैं। अंदर तक झकझोर रहे है। मन को जोश से भर देने के लिए धन्यवाद।
ReplyDeleteबहुत ही प्रेरक शब्द हैं। अंदर तक झकझोर रहे है। मन को जोश से भर देने के लिए धन्यवाद।
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